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3. तुलसी

3. तुलसी

लैटिन नाम : Ocinum Sanctum सफेद तुलसी। Ocinum Dilosum काली तुलसी ।

अंग्रेजी: Basil.

फारसी : रेहान्।

संस्कृत, हिन्दी, बंगला, गुजराती, मराठी तुलसी, सुरसा ।

परिचय

यह सभी जगह वाटिकाओं में, मन्दिरों के पास तथा आस्तिक हिन्दू परिवारों में पायी जाती है। यह २ से ३ फीट तक ऊँची होती है। इसकी शाखायें सरल एवं सघन रूप में फैली होती हैं। पत्र १ इंच से २ इंच तक लम्बे, अण्डाकार एवं सुगन्धित होते हैं। शाखाओं के अन्त में मञ्जरियाँ लगती हैं। इसका सर्वाङ्ग ही सुगन्धित होता है। सफेद तुलसी की पत्तियाँ हरे रंग की तथा डंडियाँ फीके हरे रंग की होती हैं तथा काली तुलसी के पत्ते व डंडियाँ कुछ हरे एवं बैंगनी रंग के होते हैं।

रासायनिक संगठन

इसके पत्तों में एक उड़नशील तेल प्राप्त होता है। जो कफ निःसारक है एवं प्रदूषण को दूर करता है।

गुण : लघु, रुक्ष।

रस : कटु, तिक्त।

वीर्य : उष्ण।

विपाक : कटु।

प्रयोग

तुलसी एक अति ही उपयोगी महौषधि है। सफेद तुलसी की तुलना में काली तुलसी अधिक गुणवाली मानी जाती है। इसकी पत्तियाँ कृमिनाशक हैं तथा इसके आस-पास मच्छर नहीं आते। रात्रि में तुलसी स्वरस को लगाकर सोने पर मच्छर नहीं काटते। यह उत्तम सर्प विषनाशक भी है। सर्प काटे हुए व्यक्ति के सर्पदंश स्थान पर तुलसी मूल को पीसकर लेप करने और पत्रस्वरस को कान व नाक में अच्छी तरह भरकर शंकर पार्वती का ध्यान

अर्थात् जाप करने से सर्प विष निश्चय ही अच्छा होता है।

इसके अतिरिक्त प्रतिश्याय, श्वास-कास, आमाशय शूल, दाद एवं त्वचा रोग, कर्ण शूल, दंत शूल, ज्वर, पार्श्व शूल, प्लेग, शोथ, कुष्ठ रोग, मुख रोग, यकृत प्लीहा, बवासीर, शीतहर, वातहर एवं स्वेदजनन है। इसका विशेष रूप से उपयोग औषधि के अनुपान के रूप में प्रयोग किया जाता है।

तुलसी की चाय

तुलसी पत्ती चूर्ण ३-६ माशा, इलायची दाना ३ रत्ती, आदा ३ माशा, पीपल ३ रत्ती, काली मिर्च ३ रत्ती, दालचीनी तीन रत्ती, लौंग ३ रत्ती यष्टि मधु ३ रत्ती, सभी को १० तोले खौलते पानी में डालकर २ मिनट बाद उतार लें। ५ मिनट बाद छानकर उसमें चीनी, दूध मिलाकर पीने से शीत ज्वर, वात ज्वर, विषम ज्वर एवं प्यास वमन आदि रोगों को दूर करता है।

प्रयोज्य अंग

पत्र, बीज।

मात्रा

पत्र स्वरस १ से २ तोला। बीज चूर्ण १ से २ माशा ।

तुलसी

तुलसी कटुका तिक्ता हृद्योष्णा दाहपित्तकृत । दीपनी कुष्ठ कृच्छास्र पार्श्व रूक् कफवातजित ॥ (भा० प्र०) हिक्काश्वास विषकासपार्श्वशूल पित्तकृत् कफवातघ्न सुरसः विनाशनः । समुदाहृतः ॥ च० सु० २८

हल्दी चन्दन तुलसी साथ में सेमल कांटा व मंजीठ । नवनीत संग जो लेप करे, फूल सा चेहरा दीख ॥ अर्थात् हल्दी, चन्दन, तुलसी सेमल का कांटा व मंजिष्ठा के कपड़छन चूर्ण को नवनीत के साथ मिलाकर अपने चेहरे पर जो नित्य प्रति लेप करता है उसका चेहरा फूल के समान दीखता है।

Sonu Vaatya

Medicinal Plants And Seeds Expert

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