भारत जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से समृद्ध देश में धर्म और प्रकृति का संबंध सदा से ही गहरा रहा है। विशेषकर पेड़-पौधों को भारतीय धर्मों में ईश्वर का रूप माना गया है। हिन्दू, बौद्ध, जैन और यहाँ तक कि कुछ इस्लामिक परंपराओं में भी पेड़-पौधों को सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। धर्म न केवल आत्मिक शांति का मार्ग दिखाता है, बल्कि वह हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीने की प्रेरणा भी देता है।
आज जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तो यह समझना बेहद ज़रूरी है कि धर्म हमें पहले से ही प्रकृति संरक्षण का मार्ग दिखाता रहा है।
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धार्मिक ग्रंथों में पेड़-पौधों का स्थान
हिन्दू धर्म में वृक्षों को देवस्वरूप माना गया है। तुलसी, पीपल, बरगद, आम, बेल और अशोक जैसे वृक्षों का उल्लेख वेदों, पुराणों और उपनिषदों में मिलता है।
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तुलसी को “वृक्षों की लक्ष्मी” कहा गया है। इसे घर में पूजा जाता है और इसका औषधीय महत्व भी है।
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पीपल को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास कहा गया है। इसे ‘प्राणवायु’ देने वाला वृक्ष माना जाता है।
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बरगद (वटवृक्ष) को दीर्घायु और शक्ति का प्रतीक माना गया है। वट सावित्री व्रत इसी वृक्ष की पूजा से जुड़ा है।
बौद्ध धर्म में भी बोधि वृक्ष (पीपल) का अत्यंत महत्व है, क्योंकि गौतम बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। जैन धर्म में भी कई तीर्थंकरों ने वृक्षों के नीचे ध्यान और ज्ञान प्राप्त किया।
धर्म के पर्व और वृक्ष-पूजन
भारत के अनेक धार्मिक त्योहार और रीति-रिवाज सीधे पेड़-पौधों से जुड़े हैं:
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वट सावित्री व्रत में महिलाएँ वटवृक्ष की पूजा करती हैं।
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तुलसी विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें तुलसी और विष्णु का प्रतीक शालिग्राम का विवाह होता है।
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श्रावण मास में बेल पत्र और बिल्व वृक्ष की पूजा शिवजी को समर्पित होती है।
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छठ पूजा में तालाब, नदी और सूर्य के साथ उगते पौधों की पूजा की जाती है।
ये परंपराएँ हमें यह सिखाती हैं कि वृक्ष केवल लकड़ी या फल देने वाले जीव नहीं, बल्कि वे हमारी धार्मिक चेतना के केन्द्र हैं।
धर्म और पर्यावरण संरक्षण
धर्म का मूल उद्देश्य केवल आत्मा की उन्नति नहीं है, बल्कि यह मानव को अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का बोध भी कराता है। पर्यावरण की रक्षा को धर्म ने हमेशा कर्तव्य माना है। ऋग्वेद से लेकर महाभारत तक, हर ग्रंथ में प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने की बात की गई है।
आज के युग में जब ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई और जैव विविधता का संकट बढ़ रहा है, धर्म की यह शिक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है। यदि हम धर्म के इन मूल संदेशों को अपनाएं, तो हम एक हरे-भरे और संतुलित संसार की ओर बढ़ सकते हैं।
मंदिर और हरियाली का रिश्ता
भारत के प्राचीन मंदिरों के आसपास अक्सर घने वृक्ष देखे जाते हैं। मंदिर वास्तुशास्त्र में नंदी वृक्ष, पारिजात, अशोक, और कदंब जैसे वृक्षों को विशेष स्थान दिया गया है। ये न केवल वातावरण को शुद्ध करते हैं बल्कि भक्तों को मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं।
कुछ मंदिरों में तो पेड़ों की पूजा को ही केंद्र बनाया गया है — जैसे वृक्ष देवता या “वन देवता” की परंपरा।
निष्कर्ष
धर्म और पेड़-पौधों का संबंध केवल पूजन या परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवन-दर्शन है जो हमें प्रकृति के साथ जीने की प्रेरणा देता है। अगर हम धर्म के इन मूल संदेशों को आत्मसात करें और पेड़-पौधों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि पूज्य जीव मानें, तो हम न केवल आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होंगे, बल्कि धरती को भी बचा सकेंगे।
पेड़ हमारे धर्म का हिस्सा हैं और धर्म हमारे जीवन का। यह तालमेल ही हमें संपूर्णता की ओर ले जाता है।
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