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हम इंसानों को अक्सर यह भ्रम रहता है कि केवल हम ही सोच सकते हैं, अनुभव कर सकते हैं, और संवाद कर सकते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके घर के सामने खड़ा पेड़, जो सालों से वहीं है, वह भी महसूस करता है? विज्ञान की दुनिया में हो रहे तंत्रिका प्रयोग (Neural Experiments) यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि पेड़-पौधे भी एक अलग तरह की “बुद्धिमत्ता” और “अनुभूति” रखते हैं।

पेड़ — केवल लकड़ी नहीं, जीवित प्रणाली

पेड़ न बोलते हैं, न चलते हैं और न कोई चेहरे पर भाव दिखाते हैं। फिर भी वैज्ञानिकों ने पाया है कि ये जीव बहुत ही शांत और धीमे तरीक़े से अपने वातावरण से बातचीत करते हैं।
उदाहरण के लिए, जब कोई जानवर किसी पेड़ की पत्तियाँ खाने लगता है, तो पेड़ विशेष प्रकार के रसायन छोड़ता है जो उस जानवर को नापसंद होते हैं। न केवल इतना, बल्कि वह रसायन हवा में फैलकर पास के पेड़ों को भी खतरे की सूचना देता है।

वैज्ञानिक प्रयोग जो सोच बदल रहे हैं

भारत के वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र बोस ने सबसे पहले यह दिखाया कि पौधों में भी जीवन के संकेत होते हैं। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि पेड़ स्पर्श, तापमान और प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं। उनकी खोजों को पश्चिमी वैज्ञानिकों ने पहले गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन आज के समय में वही खोजें विज्ञान की धुरी बन रही हैं।

वर्तमान में वैज्ञानिक पौधों के अंदर होने वाली विद्युत गतिविधियों और कोशिका स्तर पर होने वाले संकेतों को दर्ज करके यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि कैसे पौधे सूचनाओं को प्रोसेस करते हैं।

पेड़ों का आपसी नेटवर्क

एक बहुत रोचक बात यह है कि पेड़ अकेले नहीं रहते। वे ज़मीन के अंदर अपनी जड़ों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। यह नेटवर्क फफूंद (fungi) की मदद से बनता है और इसे वैज्ञानिकों ने नाम दिया है — Wood Wide Web

इस नेटवर्क के ज़रिए पेड़ एक-दूसरे को पोषक तत्व, पानी और खतरे की सूचना भेजते हैं। यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे हम इंटरनेट से जुड़े होते हैं और जानकारी शेयर करते हैं।

सीखने और याद रखने की क्षमता

क्या पेड़ सीख सकते हैं? यह सवाल एक समय पर अजीब लगता था। लेकिन एक विशेष प्रयोग ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया।
छुईमुई (Mimosa pudica) नामक पौधे पर प्रयोग किया गया, जिसमें बार-बार उसे गिराया गया। शुरू में वह हर बार अपनी पत्तियाँ समेट लेता था, लेकिन कुछ समय बाद उसने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया — यानी उसने “सीख लिया” कि यह घटना उसके लिए हानिकारक नहीं है।

और तो और, यह सीखा हुआ व्यवहार पौधा कई दिनों तक याद रखता है। यानी पेड़ की स्मृति भी होती है — यह एक क्रांतिकारी खोज है।

तंत्रिका प्रयोग: एक नया वैज्ञानिक क्षेत्र

इन सभी प्रयोगों के चलते एक नई वैज्ञानिक शाखा उभरी है — Plant Neurobiology। यह शाखा इस पर शोध करती है कि पौधों के पास भले ही दिमाग न हो, लेकिन फिर भी वे निर्णय कैसे लेते हैं, खतरे को कैसे पहचानते हैं और किस तरह से अपने परिवेश से तालमेल बिठाते हैं।

इन शोधों से यह भी पता चला है कि पेड़ अपनी ऊर्जा का प्रयोग सोच-समझकर करते हैं। वे सूखे मौसम में अपने विकास को धीमा कर देते हैं और अच्छे समय में तेज़ी से बढ़ते हैं।

नैतिक और पर्यावरणीय सोच में बदलाव

यदि यह साबित हो जाए कि पेड़ भी एक प्रकार की चेतना और अनुभव रखते हैं, तो यह केवल वैज्ञानिक खोज नहीं होगी, बल्कि एक नैतिक प्रश्न भी होगा।
क्या पेड़ों को भी “संवेदनशील जीव” माना जाना चाहिए?
क्या जंगलों की कटाई केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि नैतिक अपराध भी है?

इन सवालों पर विचार करना ज़रूरी है, क्योंकि पेड़ हमारे जीवन का आधार हैं — न केवल ऑक्सीजन के लिए, बल्कि उनकी “अदृश्य बुद्धिमत्ता” भी इस धरती को संतुलित बनाए रखती है।


निष्कर्ष

पेड़ केवल छाया देने वाले या लकड़ी के स्रोत नहीं हैं। वे भी महसूस करते हैं, एक-दूसरे से बात करते हैं, खतरों को पहचानते हैं, और अपने अनुभवों से सीखते हैं।
तंत्रिका प्रयोग यह दिखा रहे हैं कि प्रकृति के भीतर ऐसी कई जटिलताएं हैं जिन्हें हमने अब तक समझा ही नहीं।

अब समय है कि हम पेड़-पौधों को एक नई दृष्टि से देखें — एक सहजीवी, संवेदनशील और बुद्धिमान जीवन-रूप के रूप में। तभी हम प्रकृति के साथ सही तालमेल बैठा सकेंगे।

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